चला जाता हूँ हँसता-खेलता मौजे-हवादिस से, अगर आसानियाँ हों ज़िंदगी दुशवार हो जाए।

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Tuesday, January 17, 2012

"ठीक एक साल बाद एक बार फिर...


साल का स्वागत!...
एक साल और गया.
उभरीं कुछ यादें
भीतर दबी और पड़ी.
प्यार से पाले हुए पल और पहर
... छितराने लगे,
पीले पतझर के पहरों पर बरस-बरस छाने लगे.
निकला उनकी घनी झाड़ी से किसी तरह
क्योंकि पक गई थी भूख
जो दी गई थी ज़िंदगी के साथ,
क्योंकि थक गई थी प्यास
और पेश होना था पानी के यक्ष के आगे
किसी ज़िंदा प्यासे की तरह...

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