
गए और नये साल के दोहेः
बैठा काल बहेलिया फैला जीवन-जाल।
बरस-बरस गिरते रहे दिवस, महीने, साल।
अपना-सपना सब गया रखा जिसे भी पाल।
समय-पखेरू उड़ चला फँसा रह गया साल।
जान-माल औ चाल से रहा बहुत बेहाल।
साल-साल कर सालता रहा सालभर साल।
मँहगाई की मार से गीला आटा-दाल।
क्या बोलें, कैसे गया-गुज़रा-बीता साल?
समय-सँपेरे का सखे देखो काम कमाल!
जब जिसको चाहे पकड़ देता ज़हर निकाल।
पिद्दी सा प्यादा चला अटक-अजूबी चाल।
सत्ता की शतरंज में पिटा वज़ीरी साल।
कूढ़-जमूरों की हुई जमहूरियत जमाल।
जिसका जितना ज़ोर था, उतना उसका साल।
पर मन का मौसम कहाँ माना, लिया निकाल।
कसता है फिर-फिर समय-सारंगी पर साल।
पल-पल नूतनता रहे दिल-दिल हो खु़शहाल।
सबके शुभ की कामना रहे चकाचक साल।