चला जाता हूँ हँसता-खेलता मौजे-हवादिस से, अगर आसानियाँ हों ज़िंदगी दुशवार हो जाए।

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Wednesday, January 25, 2012

26 जनवरी, 2012 पर

धुन्ध अगर गहरा है, तो क्या ?
अन्तहीन सहरा है, तो क्या ?
क़दम कद़म पहरा है, तो क्या ?
सिंहासन बहरा है, तो क्या ?
मन-मूरख को मुसकाने का मन्त्र मुबारक हो।.
अटल छत्र की छाया में गनतन्त्र मुबारक हो।।

Tuesday, January 17, 2012

दस्तक : नये साल की

अपने दरवाज़े पे फिर वक्त ने दी है दस्तक। फिर नया साल नये ख़्वाब सजा लाया है।



اپنے دروازے پے پھر وقت نے دی ہے دستک . پھر نیا سال نے خواب سجا لیا ہے

"ठीक एक साल बाद एक बार फिर...


साल का स्वागत!...
एक साल और गया.
उभरीं कुछ यादें
भीतर दबी और पड़ी.
प्यार से पाले हुए पल और पहर
... छितराने लगे,
पीले पतझर के पहरों पर बरस-बरस छाने लगे.
निकला उनकी घनी झाड़ी से किसी तरह
क्योंकि पक गई थी भूख
जो दी गई थी ज़िंदगी के साथ,
क्योंकि थक गई थी प्यास
और पेश होना था पानी के यक्ष के आगे
किसी ज़िंदा प्यासे की तरह...

Thursday, January 14, 2010


गए और नये साल के दोहेः

बैठा काल बहेलिया फैला जीवन-जाल।
बरस-बरस गिरते रहे दिवस, महीने, साल।
अपना-सपना सब गया रखा जिसे भी पाल।
समय-पखेरू उड़ चला फँसा रह गया साल।
जान-माल औ चाल से रहा बहुत बेहाल।
साल-साल कर सालता रहा सालभर साल।
मँहगाई की मार से गीला आटा-दाल।
क्या बोलें, कैसे गया-गुज़रा-बीता साल?
समय-सँपेरे का सखे देखो काम कमाल!
जब जिसको चाहे पकड़ देता ज़हर निकाल।
पिद्दी सा प्यादा चला अटक-अजूबी चाल।
सत्ता की शतरंज में पिटा वज़ीरी साल।
कूढ़-जमूरों की हुई जमहूरियत जमाल।
जिसका जितना ज़ोर था, उतना उसका साल।
पर मन का मौसम कहाँ माना, लिया निकाल।
कसता है फिर-फिर समय-सारंगी पर साल।
पल-पल नूतनता रहे दिल-दिल हो खु़शहाल।
सबके शुभ की कामना रहे चकाचक साल।